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लग गयी...
इस वाक्य के पूरा होते होते तक मेरी भी आँखें भर आयीं। सामने देखा, थरे सभी के कपोल तर हो रहे हैं ! सेठ जी तो बिना कुछ कहें सुने ही आँसू पोंछते हुये यहाँ से उठकर चले ही गये। मैं भी अपने को रोक न पाया । इसी समय अपने आँसू पोछते हुये सुधीर ने कहा"प्रसंगान्तर की आवश्यकता है ।"
"ठीक कहते हो, सचमुच 'मूड' बिगाड़ दिया ... |
काज में शामिल होता रहूँगा । जब कभी मुझे मौक मिलता तो मैं वहाँ यजा भी जाता रहा हूँ किन्तु पचास बोधा के ऊपर खेत, बारी, बगीचा, घर-द्वार जो माँ ने छोड़ा तो फिर उनकी तरफ फूटी थाँखों से भी नहीं देखा। जब शहर में रहकर मैं पढ़ने लगा तब से चाचा लोगों का मुझप्ले मिलने-जुलने का सिलसिला चालू हुआ। मुझे भी वे बाज़ौकात सहायता करते ही ... |
न समाज, पिताजी की पूजा पीर की तरह करते थे। गाँव के जमींदार को यह सब कत्तई पसन्द नहीं था। उन दोनों के बीच रञ्जिस की यही वजह थी। उनकी मृत्यु के छः महीने पूर्व की बात है कि गाँव के पूरब तरफ, हरिजन बस्ती से सटकर, एक तालाब था, जो काफी छिछला था किन्तु पानी उसमें फिर भी बरसात का जमा हो ही जाता था । आसपास के मवेशियों के पानी प... |
पने। हाँ, तो पिताजी ने हरिजनों के नेतृत्व की बागडोर निश्चय ही सम्भाल ली होगी ।
"उस 'कुर्गजवार' में और कौन था ही उन बे-ज़बानों की तरफ.. * पास-पड़ोस ।
से बोलने वाला। शव धीरे-धीरे जमींदार के यादमियों के द्वारा हरिजनों को सताया जाना शुरू हो गया। वे सर पटक कर रह गये । बाख प्रयत्न किया किन्तु उस तालाब में जमींदार का हल नहीं ... |
स्था
को जमींदार ने अपने हाथों में ले लिया तथा अपनी निजी देख-रेख में वह सारा कार्य सम्पादन करता रहा। जमींदार कहने लग गया था. माई, शान की लड़ाई थी हमारी और पंडितजी की। मेरे लिये उनके भाई वैसे ही हैं जैसे मेरे अपने भाई । अब वह उनकी तारीफ करते नहीं था। उधर उनका काम-काज बीता और इधर मेरे चाचाद्वय अपने विश्वासीजनों के साथ जहर... |
लग गये । "
सुधीर के चेहरे पर चिह्नित हैरानी की भावनाओं को देखकर में जरा चुप हो गया। बस सुधीर मेरा मुँह ही ताकते ताकते, जैसे मुझे चुप देखकर यकायक बोल उठा -
"अरे मास्टरजी ! भला यह आप क्या कह रहे हैं ? माँ के सम्बन्ध में ऐसी बातें कहने की मला उन दोनों को कैसे हिम्मत पड़ी ? माँ क्या उनकी इज्जत नहीं थीं ?"
" सुधीर ! गँवारो... |
।इस लेख का पुनरीक्षण एवं सम्पादन होना आवश्यक है। आप इसमें सहायता कर सकते हैं। "सुझाव"
आज मैं अकेला जाकर मोदी के यहाँ खड़ा हो गया। परिचय पाकर मोदी ने एक छोटा-सा पुराना चिथड़ा बाहर निकाला और गाँठ खोलकर उसमें से दो सोने की बालियाँ और पाँच रुपये निकाले। उन्हें मेरे हाथ में देकर वह बोला, "बहू ये दो बालियाँ मुझे इकतीस रुपये ... |
अच्छी तरह समझ सकता हूँ; किन्तु हमारी ऐसी जीजी के भाग्य में इतनी बड़ी विडम्बना और अपयश क्यों लिख दिया? किसलिए तुमने ऐसी सती के मुँह पर असती की गहरी काली छाप मारकर उसे हमेशा के लिए संसार से निर्वासित कर दिया? उनको तुमने क्यों नहीं छुड़ा लिया? उनकी जाति छुड़ाई, धर्म छुड़ाया- समाज, संसार, प्रतिष्ठा, सभी कुछ तो छुड़ा लिया। ... |
ला है, किन्तु विश्वास करके पाप का भागी होना अच्छा नहीं!
उसके बाद बहुत दिनों तक इन्द्र को नहीं देखा। गंगा के तीर घूमने जाता था तो देखता था कि उसकी नाव किनारे बँधी हुई है। वह पानी में भीग रही है और धूप में फट रही है। सिर्फ एक दफे और हम दोनों उस नाव पर बैठे थे। उस नौका पर वही हमारी अन्तिम यात्रा थी। इसके बाद न वही उस नाव ... |
-पीते पूछा, "तू कहाँ रहता है रे कान्त? तेरे शरीर पर वह काला-काला सा क्या है रे? रैपर है? आह! रैपर की क्या ही शोभा है। इसके तेल की बास से तो भूत भी भाग जावें! छोकरे-फैलाकर बिछा तो दे यहाँ उसे, बैठें उस पर।"
"मैं देता हूँ, नवीन भइया, मुझे ठण्ड नहीं लगती। यह लो" कहकर इन्द्र ने अपने शरीर पर की अलवान चट से उतारकर फेंक दी। व... |
टा उठे, कि उनका वह मुँह आज भी मुझे याद आ जाता है। बोले, "तो फिर जा न, खींचता क्यों नहीं? जानवर की तरह बैठा क्यों है?"
इसके बाद एक दफे इन्द्र और एक दफे मैं रस्सी खींचते हुए आगे बढ़ने लगे। कहीं ऊँचे किनारे के ऊपर से, कहीं नीचे उतर कर, और बीच-बीच में उस बरफ सरीखे ठण्डे जल की धारा में घुसकर, हमें अत्यन्त कष्ट से नाव ले चलन... |
के प्रकाशित होते ही इन्द्र उसी दम आह्नान करके बोला, "नवीन भइया, अकेले तुम्हें डर लगेगा- हमारे साथ थोड़ा घूमना भी हो जायेगा। यहाँ कोई चोर-ओर नहीं है, नाव कोई नहीं ले जायेगा। चले न चलो।"
नवीन भइया अपने मुँह को कुछ विकृत करके बोले, "डर! हम लोग दर्जी पाड़े के लड़के हैं- यमराज से भी नहीं डरते- यह जानते हो? फिर भी नीच लोगों ... |
के इस काल में हृदय की प्रशस्सता, संवेदना की व्यापकता, जितनी बढ़ती है उतनी और किसी समय नहीं। लेकिन, इन कुछ घण्टों के संसर्ग में ही जो नमूना उन्होंने दिखाया इतने समय के अन्तर के बाद भी वह भुलाया नहीं जा सका। फिर भी, भाग्य से ऐसे नमूने कभी-कभी दिखाई पड़ जाते हैं- नहीं तो, बहुत पहले ही यह संसार बाकायदा पुलिस थाने के रूप मे... |
उसे जगाने का व्यर्थ प्रयास कर रहे थे, उसी समय, इस तरफ कुत्तों का झुण्ड इकट्ठा होकर आर्त्त चीत्कार करके इस दुर्घटना की खबर हमारे कर्णगोचर करने के लिए व्यर्थ मेहनत उठा रहा था, यह बात अब जल की तरह हमारी ऑंखों के आगे स्पष्ट हो गयी। अब भी हमें दूर पर कुत्तों का भूँकना सुन पड़ता था। अतएव जरा भी संशय नहीं रहा कि बाघ उन्हें खी... |
्द्र ने मेरे हाथ से बाँस छीनकर नाव में फेंक दिया और कहा, "मेरा भी कुछ दोष नहीं है भाई, मैं भी नवीन भइया को लाना नहीं चाहता था। परन्तु, अब अकेले लौटा भी नहीं जा सकता, मुझे तो जाना होगा।"
परन्तु मुझे भी तो जाना चाहिए। क्योंकि, पहले ही एक दफे कह चुका हूँ कि मैं स्वयं भी बिल्कुतल डरपोक न था। अतएव बाँस को फिर उठाकर मैं खड़ा... |
ले कभी ऑंख से देखा तक नहीं होगा- यह सब वे बराबर कहते रहे। जिस देह पर, इसके पहले, एक छींटा भी जल गिरने से वे व्याकुल हो उठते थे, कपड़े-लत्तों के शोक में वे उस देह को भी भूल गये। उपलक्ष्य वस्तु असल वस्तु से भी किस तरह कई गुनी अधिक होकर उसे पार कर जाती है, यह बात, यदि इन जैसे लोगों के संसर्ग में न आया जाए, तो इस तरह प्रत्... |
जीवन की प्रधन और मुख्य घटनाएँ तो अवश्य ही याद रहने की चीज़ें होतीं। परन्तु सो भी तो नहीं देखता हूँ। बचपन की बातें कहते समय एकाएक मैंने देखा कि स्मृति-मन्दिर में बहुत-सी तुच्छ क्षुद्र घटनाएँ भी, न जाने कैसे, बहुत बड़ी होकर ठाठ से बैठ गयी हैं और बड़ी घटनाएँ छोटी बनकर न जाने कब कहाँ झड़कर गिर गयी हैं। इसलिए बोलते समय भी ... |
कर नहीं सकता था, इसलिए मैं चला गया। स्टेशन से दस-बारह कोस हाथी पर बैठकर गया। देखा, बेशक राजपूत्र के बालिग होने के सब लक्षण मौजूद हैं! कोई पाँच तम्बू गड़े हुए हैं, एक स्वयं उनका, एक मित्रों का, एक नौकरों का और एक रसोई का। इनके सिवाय और एक तम्बू कुछ फासले पर था- उसके दो हिस्से करके उनमें दो वेश्याएँ और उनके साजिन्दे अवजम... |
रहा था। इस दफे एक समझदार व्यक्ति पाकर मानो वे बच गयीं। इसके बाद, रात को देर तक, मानो केवल मेरे लिए ही, उन्होंने अपनी समस्त विद्या, समस्त सौन्दर्य और कण्ठ के समस्त माधुर्य में हमारे चारों तरफ की उस समस्त कदर्न्य मदोन्मत्ता को डुबा दिया और अन्त में वे स्तब्ध हो गयीं।
बाईजी पटने की रहने वाली थीं। नाम था 'प्यारी'। उस रात्र... |
पूत्र के प्रिय पार्श्वचर थे। उनके अचूक निशाने की ख्याति मैंने आते ही सुन ली थी। वे रुष्ट होकर बोले, "चिड़ियों का शिकार क्या कुछ शर्म की बात है?"
मेरा मिज़ाज भी ठिकाने पर नहीं था, इसलिए जवाब दिया, "सबके लिए नहीं, परन्तु मेरे लिए तो है! खैर! कुमार साहब, मेरी तबियत ठीक नहीं है।" कहकर मैं तम्बू में लौट आया। इस पर कौन हँसा,... |
किन्तु दूँ किस तरह? और जगह आप चाहे जो करें, किन्तु मैं जान-बूझकर तो आपको अपना हुक़्क़ा दे न सकूँगी। अच्छा, चुरुट लाए देती हूँ। अरे ओ..."
"ठहरो, ठहरो, ज़रूरत नहीं। मेरी जेब में चुरुट हैं।"
"हैं? अच्छा तो ठण्डे होकर जरा बैठ जाइए, बहुत-सी बातें करनी हैं। भगवान कब किससे मिला देते हैं, सो कोई नहीं कह सकता, यह स्वप्न में भी ... |
उस समय यह किसी तरह खयाल भी न आया कि प्यारी के होठों की गठन कुछ इस किस्म की है कि मानो हर बात वह मजाक में ही कहती है और मन ही मन हँसती हैं। मैं चुप रह गया। वह भी कुछ देर तक चुप रहकर इस बार सचमुच ही हँस पड़ी। परन्तु, इतनी देर में न जाने किस तरह मुझे जान पड़ा कि उसने अपनी लज्जित अवस्था को मानो सँभाल लिया है। हँसकर कहा, "... |
चने लगा- यह कौन है? मैं अपनी पाँच-छः वर्ष की उम्र तक की सब घटनाएँ स्पष्ट तौर से याद कर सकता हूँ। किन्तु अतीत में जितनी भी दूर तक दृष्टि जा सकती थी, उतनी दूर तक मैंने खूब छान-बीन कर देखा, कहीं भी इस प्यारी को नहीं खोज पाया। फिर भी, यह मुझे खूब पहचानती है। बुआ तक की बात जानती है। मैं दरिद्र हूँ, सो भी इससे अज्ञात नहीं है... |
ाद भंजन कर डाले। वह चाहे जिस जाति का, चाहे जैसा, आदमी हो और चाहे जितने आदमियों को साथ लेकर जाए, आज की रात उसका महाश्मशान को जाना निष्फल नहीं होगा। आज की घोर रात्रि में उग्र श्मशानचारी प्रेतात्मा को सिर्फ ऑंख से ही देखा जा सकता हो सो बात नहीं- उसका कण्ठस्वर भी सुना जा सकता है और इच्छा करने पर उससे बातचीत भी की जा सकती ह... |
शान में, हर रात को, महाभैरवी अपने साथियों सहित नर-मुण्डों से गेंद खेलती हैं और नृत्य करती हुई घूमती हैं। उनके खिलखिला कर हँसने के विकट शब्द से कितनी ही दफे, कितनी ही अविश्वासी अंगरेज जजों, मजिस्ट्रेटों के भी हृदय की धड़कन बन्द हो गयी है।" इस किस्म की लोमहर्षक कहानी वे इस तरह से कहने लगे कि इतने लोगों के बीच, दिन के समय... |
प्रेम- मैं किसी को भी पास न फटकने दूँगा।"
"किन्तु वक्त पर हाथ में लाठी रहेगी भी?"
"ठीक इसी तरह रहेगी बाबू, आप उस समय देख लेना। कोस-भर का रास्ता है, रात को ग्यारह के भीतर ही रवाना हो जाना चाहिए।"
मैंने देखा, उसका आग्रह मानो कुछ अतिरिक्त-सा है।
जाने के लिए उस समय भी क़रीब घण्टे-भर की देर थी। मैं तम्बू के बाहर टहलकर इस वि... |
पढ़ाकर, सूई का काम सिखाकर और गृहस्थी के सब किस्म के दुरूह कार्य समझाकर, उन्होंने मनुष्य बना दिया था, इसकी कोई गिनती नहीं थी। अत्यन्त स्निग्धा शान्त-स्वभाव और चरित्र के कारण मुहल्ले के लोग भी उन्हें कुछ कम नहीं चाहते थे। किन्तु उन्हीं नीरू जीजी का जब तीस वर्ष की उम्र में हठात् पाँव फिसल गया और भगवान ने इस अत्यन्त कठिन व... |
क्यों कहती हो?"
प्रत्युत्तर में मेरा हाथ खींचकर और बन्द खिड़की की ओर लक्ष्य करके, वे चिल्ला उठीं, "जायेगा नहीं, तो क्या जान दे देगा? देखता नहीं है, मुझे ले जाने के लिए वे काले-काले सिपाही आए हैं। तू यहाँ पर मौजूद है, इसीलिए वे खिड़की में से ही मुझे डरा रहे हैं।"
इसके बाद उन्होंने कहना शुरू किया, "वे इस खाट के नीचे हैं... |
संगत ज़िद को देखकर मैं एड़ी से चोटी तक जल उठा। बोला, "अच्छा ठहरो, मैं आता हूँ।" तम्बू भीतर देखा, वारुणी की कृपा से जागता कोई नहीं है। पुरुषोत्तम भी गम्भीर निद्रा में मग्न है। नौकरों के तम्बू में सिर्फ दो-चार आदमी जाग रहे हैं। झटपट बूट पहिनकर एक कोट शरीर पर डाल लिया। राइफल ठीक रखी ही थी। उसे हाथ में लेकर रतन के साथ-साथ ... |
होती तो खुद ही अपना परिचय दे देतीं। किन्तु जब नहीं दिया है, तब मेरे मुँह से भी कोई बात नहीं सुन पाओगी। इस बीच सोचकर देखो, अपने आपको प्रकट करोगी कि नहीं? किन्तु अब और समय नहीं है- मैं जाता हूँ।"
प्यारी ने बिजली की सी तेज़ीके साथ मेरा रास्ता रोककर कहा, "यदि न जाने दूँ, तो क्या जबरन चले जाओगे?"
"किन्तु, जाने ही क्यों न दो... |
ो चाहे झूठ, अपने मरने की बात मैंने प्रसिद्ध नहीं की, मामा के जरिए माँ ने फैलाई थी। सुनना चाहते हो सब हाल?" मरने की यह बात सुनते ही मेरा संशय दूर हो गया। मैंने ठीक पहिचान लिया कि यह राजलक्ष्मी है। बहुत दिन पहले यह अपनी माता के संग तीर्थ-यात्रा करने गयी थी और फिर लौटकर नहीं आई। माँ ने गाँव में आकर यह बात प्रसिद्ध कर दी क... |
े दो, तो एक बार इस पाटे पर और एक बार उस पाटे पर बैठकर दो फूल छोड़ दूँगा। दोनों ही बहिनें एक ही साथ 'पार' हो जाँयगी। क्या एक सौ रुपये- दो साँड़ ख़रीदने का खर्च-भी आप न देंगे?" बात कुछ असंगत नहीं थी। फिर भी अनेक मोल-तोल और बड़ी सही सिफारिश के बाद सत्तर रुपये में तय होकर एक ही रात में एक साथ सुरलक्ष्मी और राजलक्ष्मी का वि... |
लते ही स्वयं जिसके वश में रही हूँ, उसे भी क्या बातों में भुलाया जा सकता है? अच्छा आज तो वैसे मैं बात कर लेती हूँ, किन्तु उस समय हर रोज जब काँटों में क्षत-विक्षत होकर माला गूँथ देती थी; तब कितनी बात किया करती थी, कहो न? वह क्या तुम्हारी मार के डर से? यह बात भूलकर भी मन में मत लाना। राजलक्ष्मी ऐसी नहीं है। किन्तु राम! रा... |
नहीं।" मैं कुछ नरम होकर बोला, "अच्छी बात है, चाहता हूँ कि आज मुझ पर कोई आफत आवे और तब तुम्हारे इस ईश्वर-दत्त धन की हाथों-हाथ जाँच हो जाये।"
प्यारी बोली, "राम-राम! ऐसी बात मत कहो। अच्छे-भले लौट आओ- इस सच्चाई की जाँच करने की ज़रूरत नहीं है। मेरे ऐसे भाग कहाँ कि वक्त-मौके पर अपने हाथ हिला-डुलाकर तुम्हें स्वस्थ सबल कर सकू... |
वह कुण्ठित नहीं हुई, उसे उसने, इतने दिनों तक, अपने इस घृणित जीवन के सैकड़ों मिथ्या प्रणयाभिनयों के बीच, किस कोने में जीवित रख छोड़ा था? कहाँ से इसके लिए वह खुराक जुटाती रही? किस रास्ते से प्रवेश करके वह उसका लालन-पालन करती रही?
मैं एकदम चौंक पड़ा। सामने ऑंख उठाकर देखा, भूरे रंग की बालू का विस्तीर्ण मैदान है और उसे चीर... |
ाए थे। मेरे सिवाय कोई और अशरीरी दर्शक वहाँ उपस्थित था या नहीं, सो भी मैं इन दो नश्वर चक्षुओं से आविष्कृत नहीं कर सका। उस समय घोर अमावास्या थी। इसलिए, खेल शुरू होने में और अधिक देरी नहीं है, यह सोच करके मैं एक रेत के टीले पर जाकर बैठ गया। बन्दूक खोलकर, उसके टोंटे की और एक बार जाँच करके तथा फिर उसे यथास्थान लगाकर, मैंने ... |
और फिर, आज उस वृद्ध व्यक्ति ने इसकी बड़ी भारी आशा भी तो दिलाई है।
एकाएक हवा का एक झोंका कितनी ही रेत उड़ाता हुआ मेरे शरीर पर से होकर निकल गया; और वह खत्म भी होने नहीं पाया कि दूसरा और फिर तीसरा भी, ऊपर से होकर निकल गया। मन में सोचने लगा कि भला यह क्या है। इतनी देर तक तो लेश-भर भी हवा न थी। अपने आप चाहे कितना ही क्यों न... |
मानो, हाथों के पास से छूती हुई जाने लगी। कानों के ऊपर वैसी ही अत्यन्त ठण्डी उसासें लगातार आने लगीं और यही मुझे सबसे अधिक परिवश, करने लगीं। मन ही मन ऐसा मालूम होने लगा कि मानो सारे प्रेत-लोक की ठण्डी हवा उस गढ़े में से बाहर आकर मेरे शरीर को लग रही है।
किन्तु, इस हालत में भी मुझे यह बात नहीं भूली कि किसी भी तरह अपने होश... |
ं।"
"चलो" कहकर मैं आगे हो लिया। रास्ता चलते-चलते रतन कहने लगा, "बाबू, धन्य है आपके साहस को। हम चार जने हैं फिर भी जिस तरह डरते-डरते यहाँ आए हैं, उसका वर्णन नहीं हो सकता।"
"तुम आए क्यों?"
रतन बोला, "रुपयों के लोभ से। हम सबको एक-एक महीने की तनख्वाह जो नकद मिली है!" इतना कहकर वह मेरे पास आया और गला धीमा करके बोला, "आपके च... |
तो वह भी वहाँ सो जाता था और हम भी सो जाते थे। अब जंगल में वह बेचारा कहाँ जाए ? उसे जहाँ जगह मिल जाए, वहीं पर उसका घर । उसका कोई ससुराल नहीं है न ! हम तो दो- एक दिन ससुराल भी जा आते हैं !
इसलिए हमने 'व्यवस्थित' कहा है न, 'एक्ज़ेक्टनेस' है। उसमें नाम मात्र भी गलती नहीं है ।
प्रत्येक पर्याय में से गुज़रकर
ये सब तो मेरी पृ... |
िकालने से नहीं जाती, बल्कि बढ़ जाती है ।
शंका नुकसान ही करवाती है
बाहर तो दूसरे लोग उल्टा कहते हैं, जिसे पूछने जाएँ वह कहेगा, 'भाई, सही बात हो तब भी शंका होती है न ! शंका नहीं होगी तो हम मनुष्य कैसे? क्या जानवरों को शंका होती है ? हम मनुष्य हैं इसलिए इन बेटियों पर शंका तो होगी ही न ?' ऐसा सिखाते हैं। मैं क्यों शंका खत्... |
ों एक सरीखे ही हैं । जिस व्यक्ति को सब पर शंका होती है वह शंकाशील। शंकाशील और मृत व्यक्ति, दोनों में फर्क नहीं है । वह मृत समान ही जीवन जीता है।
सुंदर संचालन, वहाँ शंका कैसी ?
शंका किसी भी चीज़ पर नहीं रखनी चाहिए । शंका तो महादुःख है। उसके जैसा कोई दुःख है ही नहीं ।
रात को कभी आपने हांडवा ( एक गुजराती व्यंजन) खाया है ?... |
र कपट कर सकता है न ?
दादाश्री : जहाँ खुद अपने आपके लिए सुख ढूँढते हैं वहाँ पर अच्छी बुद्धि है ही नहीं न ? अच्छी बुद्धि तो सामुदायिक सुख खोजती है कि 'मेरा पूरा परिवार सुखी हो जाए ।' लेकिन यहाँ तो बेटा अपना सुख ढूँढता है, पत्नी अपना सुख ढूँढती है, बेटी अपना सुख ढूँढती है, बाप अपना सुख ढूँढता है, हर कोई अपना-अपना सुख ढूँढ... |
ैं तो हाथ ही नहीं डालता न ! उसकी ज़िम्मेदारी कौन ले ? किसी के चारित्र संबंधी शंका नहीं करनी चाहिए। बहुत बड़ा जोखिम है । शंका तो हम कभी भी करते ही नहीं हैं। हम किसलिए जोखिम मोल लें ?
अंधेरे में, आँखों पर कितना ज़ोर दें ?
प्रश्नकर्ता : लेकिन मन में शंका सहित देखने की ग्रंथि पड़ गई हो तो वहाँ पर कैसा 'एडजस्टमेन्ट' लेना चा... |
ो वर्णन करूँ तो कोई भी जीवित ही नहीं रहेगा । अब ऐसे काल में अकेले पड़े रहो मस्ती में और ऐसा 'ज्ञान' साथ में हो तो उसके जैसा तो कुछ भी नहीं ।
यानी कि काम निकाल लेने जैसा है अभी । इसलिए हम कहते हैं न, कि काम निकाल लो, काम निकाल लो, काम निकाल लो ! यह कहने का भावार्थ इतना ही है कि ऐसा किसी काल में मिलता नहीं है और मिला है ... |
समझना कि वीतरागों का मार्ग पकड़ा है ! लोग तो फिर खुद की कमजोरी के कारण उठाकर ले जाने देते हैं न! उठानेवाला बलवान हो तो 'वाइफ' को उठाकर ले जाने देते हैं न !
यानी इनमें से कुछ भी खुद का है ही नहीं । यह सब पराया है । इसलिए अगर व्यवहार में रहना हो तो व्यवहार में मज़बूत बनो और मोक्ष में जाना हो तो मोक्ष के लायक बनो ! जहाँ प... |
ैं ? कि जहाँ 'होटल' देखें वहाँ 'खा' लेते हैं । इसलिए यह जगत् शंका रखने योग्य नहीं है । शंका ही दुःखदाई है । अब जहाँ होटल देखे, वहीं पर खा लेते हैं, इसमें पुरुष भी ऐसा करते हैं और स्त्रियाँ भी ऐसा करती हैं। फिर उस पुरुष को ऐसा नहीं होता कि 'मेरी स्त्री क्या करती होगी?' वह तो ऐसा ही समझता है कि 'मेरी स्त्री तो अच्छी है।'... |
खाता- पीता भी है ! इसलिए शंका निकाल देना । शंका से तो हाथ में आया हुआ मोक्ष भी चला जाएगा। अतः आपको ऐसा ही समझ लेना है कि इससे मैंने विवाह किया है और यह मेरी किराएदार है! बस, इतना मन में समझकर
रखना। फिर वह चाहे अन्य किसी के भी साथ घूमती रहे, फिर भी आपको शंका नहीं करनी चाहिए। आपको काम से काम है न ? आपको संडास की ज़रूरत प... |
किसी भी प्रकार से 'हेल्प' नहीं करती, शंका नुकसान ही करती है इसलिए शंका को मूल
में से, वह उगे तभी से बंद कर देनी चाहिए, पर्दा गिरा देना चाहिए । वर्ना पेड़ बन जाएगा उसका तो !
शंका का असर
शंका का अर्थ क्या है ? जो खीर लोगों को खिलानी है उस खीर में एक सेर नमक डालना, वह शंका है । फिर क्या होगा? खीर फट जाएगी। इतनी सी ज़िम्मे... |
हाथ रख दिया होगा । किसी व्यक्ति ने उसकी 'वाइफ' पर हाथ रख दिया, तब फिर सारे पर्याय खड़े हो जाते हैं, कि क्या होगा ? ! और फिर सिलसिला शुरू हो जाता है ! अबुध को तो कोई झंझट ही नहीं है, और वे भी वास्तव में अबुध नहीं होते हैं, उनका खुद का संसार चले उतनी उनमें बुद्धि होती है। उसे बाकी कोई झंझट नहीं होती । थोड़ा बहुत होकर फि... |
गा उसे?' अरे, तब यह भी नहीं करता और वह भी नहीं करता, एक तरफ रह न! नहीं तो उस लड़की के साथ घूमता रह रात दिन ! वह 'कॉलेज' में जाए तो साथ - साथ जा, और बैठ वहाँ पर । वहाँ पर 'सर' पूछें कि, 'साथ में क्यों आए हो ?' तब कहना, 'भाई, इसलिए कि मुझे शंका रहती है न, साथ रहूँगा तो शंका नहीं रहेगी न!' तब लोग तो उसे घनचक्कर कहेंगे। अर... |
माँ-बाप को उनके बेटे-बेटियों पर राग होता है अतः राग के कारण उनके दोष दिखाई ही नहीं देते जबकि दूसरे की बेटियों के सारे दोष देख सकते हैं। अपनी बेटी के दोष नहीं दिखाई देते इतना अच्छा है न, उससे तो शांति रहती है और फिर आगे की बात बाद में देख लेंगे ।
ऐसी टीका नहीं करनी चाहिए
एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, 'मेरी बेटियाँ तो बहुत सम... |
्या ?
प्रश्नकर्ता : नहीं, लेकिन फिर शंका करने का अर्थ नहीं है ।
दादाश्री : हाँ, बस! इसलिए चाहे कुछ भी कारण हो फिर भी शंका उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए। सावधानी रखनी चाहिए, लेकिन शंका नहीं करनी चाहिए। शंका हुई कि 'मृत्यु' आई समझो ।
प्रश्नकर्ता : लेकिन शंका तो अपने आप ही उत्पन्न होती है न ?
दादाश्री : हाँ, लेकिन वह भयंकर... |
तब फिर वह पकड़ लेता है उसे । फिर भूत छोड़ता नहीं है उसे, पूरी रात नहीं छोड़ता । रात को भी नहीं छोड़ता, एक - एक महीने तक नहीं छोड़ता। इसलिए शंका रखना गलत है
शंका ? नहीं, संभाल रखो
अब चार बेटियों का बाप सलाह लेने आया था, वह कह रहा था, 'मेरी ये चारों बेटियाँ कॉलेज में पढ़ने जाती हैं, तो उन पर शंका तो होगी ही न ! तो मुझे क... |
हीं है। आपको समझ में आया न ? फायदा किसमें है ? कम से कम नुकसान होने में फायदा है न ? इसलिए मैंने सभी से कहा है कि 'बेटियाँ देर से घर में आएँ, तब भी उन्हें घर में आने देना, उन्हें निकाल मत देना ।' वर्ना बाहर से ही निकाल दें, ये सख्त मिज़ाज वाले लोग ऐसे ही हैं न ? काल कितना विचित्र है ! कितनी दुःख और जलनवाला काल है ! और ... |
ा मत करना । शंका करने से खुद को ही नुकसान होता है ।
प्रश्नकर्ता : शंका में किस तरह का नुकसान होता है ? वह ज़रा समझाइए न!
दादाश्री : शंका, वह दुःख ही है न ! प्रत्यक्ष दुःख ! वह क्या कम नुकसान है? शंका में गहरा उतरे तो मरणतुल्य दुःख होता है ।
प्रश्नकर्ताः वह शूल की तरह रहता है ?
दादाश्री : शूल तो अच्छा है लेकिन शंका में ... |
हीं आएगा आएगा या नहीं आएगा? नुकसान रुकेगा या नहीं रुकेगा ? ' अरे, जो 'नहीं है' वह नहीं है। जो रुकना नहीं है, तो 'नहीं है' वह रुकेगा ही नहीं और रुकना है तो रुक जाएगा। तो उसके लिए क्या झंझट करनी ? इसलिए जो 'नहीं वह नहीं है और जो 'है' वह है, इसलिए शंका रखने का कोई कारण ही नहीं है ।
'व्यवस्थित' के अर्थ में ऐसा नहीं कह सकते... |
ि जिससे यह बदल सके इसलिए जो 'है' वह है और जो 'नहीं है' वह नहीं है। लेकिन अज्ञानी यदि इसका उल्टा अर्थ निकाले तो नुकसान कर बैठेगा । ये बातें तो जिनके पास 'ज्ञान' है, उनके लिए हैं !
जिस प्रकार भगवान के बताए हुए तत्व हैं वे जो 'हैं' उतने ही तय कर रखे हैं न और जो 'नहीं है' उन्हें नहीं कहा है । वैसे ही इसमें भी जो 'है' वह है... |
्ष चाहिए तो शंका नहीं करनी चाहिए । वर्ना फिर भी, अज्ञानता में तो वैसा होगा ही। जबकि यह तो 'ज्ञान' का लाभ मिल रहा है, मुक्ति का लाभ मिल रहा है और जो 'है' वही हो रहा है । इसलिए शंका रखने का कोई कारण नहीं है । शंका बिल्कुल छोड़ देना । 'दादा' ने शंका करने को मना किया है ।
यह तो खुद की ही निर्बलता
प्रश्नकर्ता : इस शंका से, ... |
गया । फिर कभी उस स्त्री के कंधे पर हाथ रख दिया होगा, तो उसे फिर से वहम हुआ । 'दादा' की दृष्टि बिगड़ गई लगती है, ऐसा उसके मन में घुस गया । मैं तो समझ गया कि इस भले आदमी को वहम हो गया है, उस वहम का उपाय तो, अब क्या हो सकता था?! तो मैंने ऐसा माना कि दुःखी हो रहा होगा।
फिर उसने मुझे पत्र लिखा कि, 'दादाजी, मुझे ऐसा दुःख हो... |
हैं । वह दोषों से भरा हुआ हो तो कहाँ जाए बेचारा ?! लेकिन उस वजह से हमने ऐसा नहीं कहा कि 'तू ऐसा है'। 'मैं और तू' कहा तो भेद पड़ जाएगा। हो चुका फिर ! और यहाँ तो सबकुछ अभेद ! आपको लगा न, ऐसा अभेद ? ! यानी कि 'तूने ऐसा क्यों किया' ऐसा- वैसा कुछ भी नहीं । मुझमें ऐसी जुदाई है ही नहीं । वर्ना यदि शंका करे न, तो भेद पड़ जाता... |
दिखेगा ? ! वह है ही प्याज़, उसमें डाँटने जैसा क्या है ? ! मूली में मूली के स्वभाव वाली सुगंधी होती ही है। प्याज़ अगर उस कोने में रखी हो तो वहाँ पर शोर मचाती रहती है तो यहाँ तक गंध आती है वह उसका स्वभाव है । हम समझते हैं कि यह ऐसे स्वभाव का है।
हम यदि उल्टा करने जाएँगे तो उस पर से कृपा चली जाएगी जिससे उसका अहित हो जाएग... |
पाँच लाख रुपये दिए हों और शंका होने लगे न, तब भी शंका से कहना कि, 'अब तू चली जा । मैंने दे दिए, वे दे दिए। वे जाने होंगे तो जाएँगे और रहने होंगे तो रहेंगे!' सामने वाले पर शंका तो बिना बात के दोष बंधवाती है और यदि कभी मुझ जैसे को रुपये दिए हों और वह शंका करे तो उसकी क्या दशा होगी? यानी कि यह जगत् किसी भी जगह पर शंका करन... |
ृतिपूर्वक शंका करो, उसे रुपये दो तभी से शंका करो ।
जहाँ लाख रुपये दिए हों, उस समय ऐसा लगे कि 'पार्टी ठीक नहीं है, ' तब भी शंका उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए । 'अब क्या होगा ?' इसी को कहते हैं वापस शंका होना । क्या होना है आखिर ? यह शरीर भी जाने वाला है और रुपये भी जाने वाले हैं। सभी कुछ चला जाने वाला है न ? ! रोना ही है... |
चे गिर जाएगी न, तब भगवान भी नीचे गिर जाएँगे ! दुनिया कभी भी गिरेगी ही नहीं ।
हम नेपाल की यात्रा में बस लेकर गए थे। तब रास्ते में यू.पी. में रात को बारह बजे एक शहर आया था । कौन सा था वह शहर ?
महात्मा : बरेली था वह ।
दादाश्री : हाँ । तो बरेली वाले सारे फौज़दार, और कहने लगे कि, 'बस रोको ।' मैंने पूछा कि, 'क्या है ?' तब उन... |
देते, उठ जाए तब भी उसे खोदकर निकाल देते हैं ।
समाधान ज्ञानी के पास से
और धंधा बैठ जाएगा, ऐसा लगे तो उसकी चिंता करता है, उसके लिए शंका होती रहती है कि, 'धंधा बैठ जाएगा तो क्या होगा ? धंधा बैठ जाएगा तो क्या होगा ?" अरे, शंका मत करना । यह तो कहेगा कि, 'तेज़ी वाले लोग तो हमेशा तेज़ी में ही रहेंगे और मंदी वाले लोग तो हमेशा ... |
र्ता : लेकिन वह तो अपने आप ही शुरू हो जाता है और अपने आप ही बंद हो जाता है ।
दादाश्री : जब वह बंद हो जाए तो फिर कहना कि 'अभी तक
निकाल नहीं हुआ है तो क्यों बंद हो गया है ? वापस आ ।' ऐसा कहना !
ऐसा है, नुकसान के प्रश्न के बारे में सोचने में हर्ज नहीं है लेकिन जब तक नुकसान की भरपाई नहीं होती, तभी तक सोचते रहें तो काम का ह... |
म 'ज्ञान' होने के पहले से ही एक बात समझ गए थे । हमें एक जगह पर शंका हुई थी कि, 'यह व्यक्ति ऐसा करेगा, धोखाधड़ी करेगा ।' इसलिए फिर हमने तय किया कि शंका करनी हो तो पूरी जिंदगी करनी है, वर्ना शंका करनी ही नहीं है । शंका करनी है तो ठेठ तक करनी है क्योंकि उसे भगवान ने जागृति कहा है । यदि करने के बाद शंका बंद हो जानी है तो क... |
वैसी आती है इसलिए तू शंका मत रखना । इस जगत् में शंका करने जैसा अन्य कोई दुःख है ही नहीं। शंका करने से तो पहले खुद का ही बिगड़ता है, उसके बाद सामने वाले का बिगड़ता है। हमने तो पहले से ही ये खोज कर ली है कि शंका से अपना खुद का ही बिगड़ता है।
सबकुछ जाने, फिर भी शंका नहीं
इसलिए हमने कभी भी किसी पर शंका नहीं की है। हम बारी... |
म हो जाएगा। इसी तरह काम करते रहने के बजाय अगर सहज छोड़ दोगे तो काम अच्छा होगा । जहाँ थोड़ी सी भी शंका रहे वहाँ किसी भी प्रकार का कार्य नहीं हो पाता ।
प्रश्नकर्ता : फिर भी कोई भी कार्य करने में शंका-कुशंका होती रहती है, तो क्या करना चाहिए ?
दादाश्री : वह झंझट वाला ही है न ! वह ज़रा मुश्किल में डाल
प्रश्नकर्ता : तब क्या ... |
में शंका मत रखना और अगर आपको शंका हो तो वह काम मत करना। 'आइदर दिस ऑर देट !' ऐसा तो कहीं होता होगा? जो ऐसी बात करे उसे तो उठाकर कहना कि, 'घर जा । यहाँ पर नहीं ।' शूरवीरता की बात होनी चाहिए।
हमें घर जाना हो और कोई एक व्यक्ति ऐसा कहता रहे, 'घर जाते हुए कहीं टक्कर हो जाएगी तो क्या होगा? या फिर एक्सिडन्ट हो जाएगा तो क्या हो... |
त्पन्न हुई, अब वहाँ पर उसके लिए कोई 'प्रिकॉशन' वगैरह लेने की कोई ज़रूरत नहीं रहती ?
दादाश्री : 'प्रिकॉशन' लेने से ही बिगड़ता है न ! अज्ञानी के लिए ठीक है। यदि इस किनारे पर आना हो तो इस किनारे का सबकुछ एक्ज़ेक्ट करो । उस किनारे पर रहना हो तो उस किनारे का एक्ज़ेक्ट रखो। यदि शंका करनी हो तो उस किनारे पर रहो । बीच रास्ते म... |
र भी शंका आती ही नहीं । वह सेफसाइड है या नहीं ?
प्रश्नकर्ता : बहुत बड़ी 'सेफसाइड ।'
दादाश्री : शंका का नाम तक नहीं । जेब में से रुपये निकालते हुए देख लिया हो तो भी उस पर शंका नहीं और दूसरे भयंकर गुनाह किए हों तो भी शंका - वंका, राम तेरी माया ! जानते ज़रूर हैं, जानकारी में होता है। हमारे ज्ञान में होता है कि 'दिस इज़ दि... |
ल देते हैं । वर्ना और कोई निकाल नहीं सकता । इंसान से खुद से शंका नहीं निकाली जा सकती । वह तो बड़े से बड़ा भूत है । वह तो डायन कहलाती है।
आप इस तरफ गए हों और वहाँ से कोई व्यक्ति आ रहा हो, वह व्यक्ति किसी स्त्री के कंधे पर हाथ रखकर चल रहा हो और आपकी नज़र पड़े तो क्या होगा आपको? उसने हाथ किसलिए रखा वह तो वही बेचारा जाने, ... |
ना । इस 'रेल्वे' के सामने ज़रा सी भी भूल करे, निमंत्रण दें, तो क्या होगा ?
प्रश्नकर्ता : कट जाएगा।
दादाश्री : वहाँ कितना समझकर रहता है ?! किसलिए समझदारी से रहते हैं लोग? क्योंकि वह तुरंत फल देता है इसलिए जबकि इस शंका का फल देर से मिलता है। उसका फल क्या आएगा, वह आज दिखाई नहीं देता इसलिए इस प्रकार निमंत्रित करते हैं । शं... |
डॉक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य ही कहिए या व्यावसायिक सिद्धान्तों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली। उनका घर सँकरी गली में था; पर उनके जी में खुली जगह में घर लेने का विचार तक न उठा। औषधालय की आलमारियाँ, शीशियाँ और डाक्टरी यंत्र आदि भी साफ-सुथरे न थे। मितव्ययिता के सि... |
े पचीस-पचीस रुपये की गड्डियाँ लगायी थीं, पूरी तीस गड्डियाँ थीं, खूब याद है। मैंने एक-एक गड्डी गिन कर थैली में रखी, स्मरण-शक्ति मुझे धोखा नहीं दे रही है। सब मुझे ठीक-ठीक याद है। बक्स का ताला भी बंद कर दिया था, किंतु ओह, अब समझ में आ गया, कुंजी मेज पर ही छोड़ दी, जल्दी के मारे उसे जेब में रखना भूल गया, वह अभी तक मेज पर प... |
और सिनेमा का आनन्द न उठा सकूँ। मैं सब ओर से अपने मन को मारे रहता हूँ, इसीलिए तो कि मेरे पास चार पैसे हो जायँ, काम पड़ने पर किसी के आगे हाथ फैलाना न पड़े। कुछ जायदाद ले सकूँ, और नहीं तो अच्छा घर ही बनवा लूँ। पर इस मन मारने का यह फल ! गाढ़े परिश्रम के रुपये लुट जायँ। अन्याय है कि मैं यों दिनदहाड़े लुट जाऊँ और उस दुष्ट का... |
ी क्या हो जायगी। जहाँ पाँच सौ गये हैं, दो-चार रुपये का खून और सही। यह समय भी अच्छा है। भीड़ कम होगी, चलना चाहिए।
जी में यह निश्चय करके डॉक्टर साहब उस ओझे के घर की ओर चले, जाड़े की रात थी। नौ बज गये थे। रास्ता लगभग बन्द हो गया था। कभी-कभी घरों से रामायण की ध्वनि कानों में आ जाती थी। कुछ देर के बाद बिलकुल सन्नाटा हो गया।... |
ऐसा करने का साहस न हो।
अंत में वे ओझे के घर के पास जा पहुँचे। लोगों की भीड़ न थी। उन्हें बड़ा संतोष हुआ। हाँ, उनकी चाल कुछ धीमी पड़ गयी। फिर जी में सोचा, कहीं यह सब ढकोसला ही ढकोसला हो तो व्यर्थ लज्जित होना पड़े। जो सुने, मूर्ख बनाये। कदाचित् ओझा ही मुझे तुच्छबुद्धि समझे। पर अब तो आ गया, यह तजरबा भी हो जाय। और कुछ न हो... |
कितना कठिन है ?
बुद्धू हाँ बाबू जी ! फिर एक बार अच्छी तरह सोच लीजिए। मूठ तो मैं चला दूँगा, लेकिन उसको उतारने का जिम्मा मैं नहीं ले सकता।
डॉक्टर अभी कह तो दिया, मैं तुमसे उतारने को न कहूँगा, चलाओ भी तो।
बुद्धू ने आवश्यक सामान की एक लम्बी तालिका बनायी। डॉक्टर साहब ने सामान की अपेक्षा रुपये देना अधिक उचित समझा। बुद्धू राज... |
निकलता है ?
अहल्या मैं तो अब सोने जाती हूँ, उनका जब जी चाहे आयें। कोई सारी रात बैठा पहरा देगा।
यही बातें हो रही थीं कि डॉक्टर साहब घर आ पहुँचे। अहल्या सँभल बैठी; जगिया उठकर खड़ी हो गयी और उनकी ओर सहमी हुई आँखों से ताकने लगी। माँ ने पूछा आज कहाँ इतनी देर लगा दी ?
डॉक्टर तुम लोग तो सुख से बैठी हो न ! हमें देर हो गयी, इस... |
भी यही दशा होती, सदा के लिए सीख जाता।
अहल्या पाँच सौ रुपये के पीछे प्राण ले लेते ?
डॉक्टर पाँच सौ रुपये के लिए नहीं, आवश्यकता पड़े तो पाँच हजार खर्च कर सकता हूँ, केवल छल-कपट का दंड देने के लिए।
अहल्या बड़े निर्दयी हो।
डॉक्टर तुम्हें सिर से पैर तक सोने से लाद दूँ तो मुझे भलाई का पुतला समझने लगो, क्यों ? खेद है कि मैं त... |
समझते थे, मेरे बदले का वार किसी सजीव मनुष्य पर होगा; यहाँ तक कि वे अपनी स्त्री और लड़के को भी इस वार के योग्य समझते थे। पर मरे को मारना, कुचले को कुचलना, उन्हें अपना प्रतिघात मर्यादा के विपरीत जान पड़ा। जगिया का यह काम क्षमा के योग्य था। जिसे रोटियों के लाले हों, कपड़ों को तरसे, जिसकी आकांक्षा का भवन सदा अंधकारमय रहा ह... |
बार इधर-उधर घूम जाने का विचार हुआ पर अंतःप्रेरणा ने सीधी राह से हटने न दिया। यहाँ तक कि बुद्धू का घर दिखाई पड़ा। डॉक्टर जयपाल की जान में जान आयी। बुद्धू के दरवाजे पर जा कर जोर से कुण्डी खटखटायी। भीतर से कुत्ते ने असभ्यतापूर्ण उत्तर दिया, पर किसी आदमी का शब्द न सुनायी दिया। फिर ज़ोर-ज़ोर से किवाड़ खटखटाये, कुत्ता और भी... |
ठिन हो जाय।
डॉक्टर अब उसकी जान तुम्हारे ही बचाये बचेगी, इतना धर्म करो।
बुढ़िया दूसरे की जान की खातिर कोई अपनी जान गढ़े में डालेगा ?
डॉक्टर तुम रात-दिन यही काम करते हो, तुम उसके दाँव-घात सब जानते हो। मार भी सकते हो, जिला भी सकते हो। मेरा तो इन बातों पर बिलकुल विश्वास ही न था, लेकिन तुम्हारा कमाल देख कर दंग रह गया। तुम्ह... |
र में कुछ ?
डॉक्टर साहब ने संकोच करते हुए ढाई सौ रुपये कहे। बुद्धू राजी हो गया, मामला तय हुआ, डॉक्टर साहब उसे साथ लेकर घर की ओर चले। उन्हें ऐसी आत्मिक प्रसन्नता कभी न मिली थी। हारा हुआ मुकदमा जीत कर अदालत से लौटने वाला मुकदमेबाज भी इतना प्रसन्न न होगा। लपके चले जाते थे। बुद्धू से बार-बार तेज चलने को कहते। घर पहुँचे तो ... |
ा। एक क्षण में उसकी सूरत डरावनी हो गयी, लपटें-सी निकलने लगीं। बार-बार अँगड़ाइयाँ लेने लगा। इसी दशा में एक बेसुरा गाना आरम्भ किया, पर हाथ जगिया के सर पर ही था। अंत में कोई आध घंटा बीतने पर जगिया ने आँखें खोल दीं, जैसे बुझते हुए दीये में तेल पड़ जाय। धीरे-धीरे उसकी अवस्था सुधरने लगी। उधर कौवे की बोली सुनाई दी, जगिया एक अ... |
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